किसे भूलू व् केसे याद करू
आदमी वक्ती तौर पर बेहद जजबाती होता हैं। डायरी के पन्ने अधूरे रह जाते हैं जब आप किसी को उसमे जगह देना उचित न समझे। आखिर कौन से वे पल हैं जिन्हें समेत कर रखा जा सकता हैं। इस पन्ने पर कुछ लिखने के पहले विचार बनाने की जरूरत नहीं हैं । आज मैंने कई ब्लोगों को देखा। थोड़ी फुरसत सी थी, वरना अखबार की दुनिया में सिर्फ खबरे ही खबरे होती हैं। उनसे जूझते हुए अलग से कुछ पढने व लिखने की सूझ पैदा कर पाना बड़ा ही मुश्किल काम हैं। कई बार सोच बनी की आखिर जो हम प्रतिदिन लोगो के सामने लिखकर परोसते हैं उसकी कोई जरुरस्त भी हैं क्या। दुनिया अपनी ही गतिमती से विचरती व कार्य करती हैं। बड़े रशुख वालो की सब सुनते हैं , तन्हा आदमी बेवक्त मारा जाता हैं। आज के इस दौर में भला कोई किसी को समझाने को तैयार हैं। कई लोग नामचीन व गैर नामचीनो से रोज मुलाकात होती हैं, सब अपने मतलब की बाते कहते व सुनते हैं। ............

4 Comments:
ब्लागिंग की दुनिया में आपका स्वागत है. आपकी अभिव्यक्ति की शैली प्रभावकारी है. यूं ही लिखते रहें...
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इंटरनेट के जरिए अतिरिक्त आमदनी के इच्छुक साथी यहां पधारें- http://gharkibaaten.blogspot.com
"सब अपने मतलब की बाते कहते व सुनते हैं।"
कहते है अत्याचार करना और अत्याचार सहना दोनों पाप है
मैंने कभी किसी के साथ अत्याचार नहीं पर अत्याचार सहा बहुत है..
अपने को पापी समझता हूँ जब भी कोई समझौता करता हूँ .
इसी तरह आधी ज़िन्दगी हाथों से निकाल चुकी है अपने ज़मीर को जिंदा रखने की कशमाकश में ..
हिंदी ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है ..एक अच्छा प्रयास .
http://www.youtube.com/mastkalandr
इस सुंदर से चिट्ठे के साथ आपका हिंदी ब्लॉग जगत में स्वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!
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