हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय चेतना लुप्त
हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय चेतना को ढूढ़ता रहता हु, जाने किस गली में इसकी चर्चा चलती रहती हैं। राष्ट्रीय स्वाभिमान को दरकिनार कर चाहे कितना भी दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, प्रेमचंद साहित्य पर चर्चा कर ले, देश की समस्याओ को पार नहीं पाया जा सकता। ऐसा इस लिए की इन सब के मूल में राष्ट्रीयता की भावना का विलुप्त होना एक बड़ी समस्या हैं । आखिर कैसे समाज का निर्माण हम करना चाहते हैं, यह समझने में भूल हो रही हैं , साहित्य सदैव समाज का पथ प्रदर्शक रहा हैं। साहित्य के नेपथ्य में चले जाने की सबसे बड़ी पीड़ा समाज को भुगतनी पड़ रही हैं। आज डायरी के पन्ने लिखने बैठा तो कई बाते चलचित्र की भाती सामने उभरने लगी, ये चित्र कथाये इस लिए हैं कि उसे देख सुन कर भूल जाया जाये । हमारे राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष के नीव बने पुरखो की वीर गाथाये आज उसी तरह भुला दी गयी हैं।

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home