किसे भूलू व् केसे याद करू
आदमी वक्ती तौर पर बेहद जजबाती होता हैं। डायरी के पन्ने अधूरे रह जाते हैं जब आप किसी को उसमे जगह देना उचित न समझे। आखिर कौन से वे पल हैं जिन्हें समेत कर रखा जा सकता हैं। इस पन्ने पर कुछ लिखने के पहले विचार बनाने की जरूरत नहीं हैं । आज मैंने कई ब्लोगों को देखा। थोड़ी फुरसत सी थी, वरना अखबार की दुनिया में सिर्फ खबरे ही खबरे होती हैं। उनसे जूझते हुए अलग से कुछ पढने व लिखने की सूझ पैदा कर पाना बड़ा ही मुश्किल काम हैं। कई बार सोच बनी की आखिर जो हम प्रतिदिन लोगो के सामने लिखकर परोसते हैं उसकी कोई जरुरस्त भी हैं क्या। दुनिया अपनी ही गतिमती से विचरती व कार्य करती हैं। बड़े रशुख वालो की सब सुनते हैं , तन्हा आदमी बेवक्त मारा जाता हैं। आज के इस दौर में भला कोई किसी को समझाने को तैयार हैं। कई लोग नामचीन व गैर नामचीनो से रोज मुलाकात होती हैं, सब अपने मतलब की बाते कहते व सुनते हैं। ............
