Monday, December 19, 2011

भिखारी के गाँव में अनगढ़ कला का सौन्दर्य बोध

" जा उधो अतने सुधि काहीह, तनिको सहत नइखे पीर,कहत भिखारी बिहारी न आइले, फूटी गईले तक़दीर " गीत की प्रस्तुति और लाल जैकेट में लोक मंच पर विदेशिया की भूमिका में उतरे ८० वर्षीय गोपाल जी, बटोही शिवलाल व् प्यारी सुन्दरी बने लखन मांझी ने जब समा बंधा तो शामियाना में ठिठुरते दर्शको के बीच उत्साह का संचार हो गया , तालियों की गूंज उनकी गर्म जोशी को व्यक्त करने लगी। इसके पूर्व " लव कुश के सामने सब के टूटल अभिमान- भगवान भगवान के बोल पर झाल व तबले की थाप लगी तो मुबई फिल्म इंडस्ट्री के नामचीन कलाकार भी अपने को रोक न सके । सबके पैरो और उंगलियों की थिरकन सी आ गयी। मौका था लोक चेतना के महान विभूति भिखारी ठाकुर की १२४ वी जयंती पर उनके गांव कुतुबपुर में सांस्कृतिक महोत्सव का।

Friday, November 25, 2011

हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय चेतना लुप्त

हिंदी साहित्य में राष्ट्रीय चेतना को ढूढ़ता रहता हु, जाने किस गली में इसकी चर्चा चलती रहती हैं। राष्ट्रीय स्वाभिमान को दरकिनार कर चाहे कितना भी दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, प्रेमचंद साहित्य पर चर्चा कर ले, देश की समस्याओ को पार नहीं पाया जा सकता। ऐसा इस लिए की इन सब के मूल में राष्ट्रीयता की भावना का विलुप्त होना एक बड़ी समस्या हैं । आखिर कैसे समाज का निर्माण हम करना चाहते हैं, यह समझने में भूल हो रही हैं , साहित्य सदैव समाज का पथ प्रदर्शक रहा हैं। साहित्य के नेपथ्य में चले जाने की सबसे बड़ी पीड़ा समाज को भुगतनी पड़ रही हैं। आज डायरी के पन्ने लिखने बैठा तो कई बाते चलचित्र की भाती सामने उभरने लगी, ये चित्र कथाये इस लिए हैं कि उसे देख सुन कर भूल जाया जाये । हमारे राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष के नीव बने पुरखो की वीर गाथाये आज उसी तरह भुला दी गयी हैं।

Wednesday, July 7, 2010

किसे भूलू व् केसे याद करू

आदमी वक्ती तौर पर बेहद जजबाती होता हैं। डायरी के पन्ने अधूरे रह जाते हैं जब आप किसी को उसमे जगह देना उचित न समझे। आखिर कौन से वे पल हैं जिन्हें समेत कर रखा जा सकता हैं। इस पन्ने पर कुछ लिखने के पहले विचार बनाने की जरूरत नहीं हैं । आज मैंने कई ब्लोगों को देखा। थोड़ी फुरसत सी थी, वरना अखबार की दुनिया में सिर्फ खबरे ही खबरे होती हैं। उनसे जूझते हुए अलग से कुछ पढने व लिखने की सूझ पैदा कर पाना बड़ा ही मुश्किल काम हैं। कई बार सोच बनी की आखिर जो हम प्रतिदिन लोगो के सामने लिखकर परोसते हैं उसकी कोई जरुरस्त भी हैं क्या। दुनिया अपनी ही गतिमती से विचरती व कार्य करती हैं। बड़े रशुख वालो की सब सुनते हैं , तन्हा आदमी बेवक्त मारा जाता हैं। आज के इस दौर में भला कोई किसी को समझाने को तैयार हैं। कई लोग नामचीन व गैर नामचीनो से रोज मुलाकात होती हैं, सब अपने मतलब की बाते कहते व सुनते हैं। ............

Sunday, November 30, 2008

मुंबई में आतंकवादी हमला जिम्‍मेवारी तय हो

मुंबई में आतंकवादी हमले के कारण जो स्थिति बनी उसका असर प्रत्‍येक भारतीय जनमानस पर पडा है, इसे कमोबेश सभी प्रमुख ब्‍लॉगों पर प्रमुखता दी गयी है। खासकर, सिनेमा से संबंद्व प्रमुख कलाकारों के द्वारा लिखी गयी पंक्तियों को मीडिया ने भी तवज्‍जों दी है। सुपर स्‍टार अमिताभ बच्‍चन ने जहां एक ओर स्पिरिट आफ मुंबई कहना बंद करने की सलाह दी है, तो आम‍िर खान ने कहा कि आतंक का कोई धर्म नही होता। इसी प्रकार मीडिया से संबंद्व सभी स्‍तर पर लोगों ने चंद आतंकवादियों को खुलेआम तीन दिनों तक हंगाम,बर्बादी व तबाही का मंजर फैलाते देखा सुना। पिछले तीन दिनों तक हमें यह दिखा की आज भी राजनेताओं से ज्‍यादा हमारे देश की चिंता हमारे सुरक्ष्‍ाा बलों को है। वे अपने प्राण न्‍योच्‍छावर कर के भी लोगों को दहशतगर्दी से निकालना जानते है। हमारे राजनेताओं को इससे सीख लेनी चाहिये क्‍योकि अंतत यह देश ही हमारे आने वाली पीढियों के लिए,हमारे स्‍वजनों व परिजनों के जीवनयापन व विकास का साधन होगा। न तो भविष्‍य में जो आज काम आए उस सुरक्षा बलों के जवान रहेंगे, न अपने को निर्णायक व महत्‍वपूण् मानकर देश की शांति व सम़द्वि में हस्‍तक्षेप करने वाले राजनेता रहेंगे। यह ठीक है कि लोकतंत्र में सुरक्षाबलों व सेना के उपर जनता के प्रतिनिधि होने चाहिये ताकि जनपक्षीय दबाब उनपर बना रहे वे निरंकुश न हो, किंतू हमें यह भी तय करना होगा कि उन्‍हें देश व समाज हित में कार्य करने की पुरी स्‍वतंत्रता भी हो। सुरक्षा एजेंसिया अपने भीतर ही नियंत्रण की प्रणाली विकसित करें ताकि कार्य में लापरवाही बरते जाने वालों व देश की अस्मिता के साथ खिलवाड करने वालों से निबटा जा सके। उन्‍हें हुकूम का गुलाम बनाकर रखना देश के साथ धोखा है। इतना तो निश्चित है कि जो कौमें अपनी सुरक्षा के प्रति लापरवाह होती है उन्‍हें मिट जाना चाहिये। प्रक़ति ने एक चींटी को भी इतना ताकतवर बनाया है कि जब वह हाथी की सुंढ में घुस जाए तो उसकी मौत का वायस बन जाती है। हमें यह देखना होगा कि समाजिक संरचना का विकास हम किस प्रकार कर रहे है,उनमें राजठाकरे टाईप लोगों,सांप्रदायिक विद्वेष फैलाकर अपनी रोटी सेकनें वालों के उभरने की कितनी संभावनाएं है। पोटा या अन्‍य कानूनों की बात करने वालों को यह भी गौर करना चाहिये कि पहले से लागू किये गये कानूनों का क्‍या ह्रस हो रहा है। क्‍या सुरक्षा को लेकर हमने अपनी जिम्‍मेवारियों को समझा है. पूरे भारतीय परिवेश में मुंबई इन दिनों प्रतीक के रूप में उभरा है. कभी यहां शिवसेना की सांप्रदायिक राजनीति हावी होती है तो कभी राजठाकरे की क्षेत्रीयतावाद की राजनीति तो कभी अंडर वर्ल्‍ड के खौफ के साए में लोग दहशत में रहते है. यहां मीडिया का रोल भी कमोबेश उजागर हुआ है. तरूण भारत ने जहां हेमंत करकरे के पुत्र द्वारा नशीली दवाओं के सेवन करने संबंधी खबरे दी तो सामना ने हिंदू विरोधी अधिकारियों के नाम पते उजागर करने व शिवसेना कार्यकर्ताओं द्वारा उन अधिकारियों के घरों के बाहर प्रदर्शन करने संबंधी खबर प्रकाशित की. हद तो यह है कि हमेशा तेज गति से आगे रहने वाली इलेक्‍ट्रानिक मीडिया भी घंटों बाद इतने बडे हमले को समझ सकी. देश भक्ति का जजबा तो उनमें दूसरे तीसरे दिन ही आया. एक चैनल ने तो आतंकवादियों की तस्‍वीरे तक दिखा दी. खबर है कि जब बाहर पुलिस अधिकारी आतंकवादियों के शिकार हुए तो ताज के अंदर छिपे आतंकी जश्‍न मना रहे थे। सूचना के इस कदर लापरवाह होने का नतीजा यह भी हो सकता है कि विदेशों में बैठे आका इससे अगली रणनीति तय कर रहे हो। हमें अपनी सुरक्षा को लेकर किसी भी स्‍तर पर लापरवाही नही बरती चाहिये,खासकर यह जिम्‍मेदारी तय होनी चाहिये कि राष्‍ट्रीय विपत्ति के क्रम में,आतंकवादी गतिविधियों या बाहय आ‍क्रमण के समय बरती जाने वाली कोताही को किसी सूरत में बख्‍शा नही जायेगा। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक पूरे देश को ग़ह मंत्री शिवराज पाटिल के इस्‍तीफे व वित्‍त मंत्री रहे पी चिदंबरम द्वारा पदभार संभाले जाने की सूचना आ चुकी है। क्‍या यह वह समय नही है जब सिर्फ इस्‍तीफे को अपनी जिम्‍मेवारी से बचने का माध्‍यम भर न माना जाये बल्कि इस प्रकार की लापरवाही बरते जाने के लिए राजनेताओं को भी दोषी बनाया जाये. अतंत देश सबका है, देश की सुरक्ष्‍ाा की जिम्‍मेवारी सब पर है.

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Saturday, November 8, 2008

ब्‍लॉग क्‍या सिफ ब्‍लॉग्‍ा क्‍या सिर्फ मन की भडास है

मेरी नजर अचानक एक ऐसे लेख पर पडी जिसमें ब्‍लॉग को मीडिया की गटर गंगा का हिस्‍सा बताया गया है. ऐसे में प्रश्‍न यह उठता है कि क्‍या ब्‍लॉग लेखन सचमुच इतना गंभीर नही है, इसके पाठक इसके बारे में क्‍या राय रखते है, इसकी समझ अब तक नहीं बन पा रही है. दूसरे अर्थो में यही समझा जा रहा है कि ब्‍लॉग सिर्फ मन की भडास मात्र है. मेरी राय में ऐसा नहीं है. खासकर, जब कोई पत्रकारिता जगत का व्‍यक्ति ब्‍लॉगिंग से जुडता है तो निसंदेह मेन स्‍ट्रीम में छुट जाने वाली बातों को रखने का प्रयास करता है. ये छूट गयी बातें मीडिया की गटर से निकली नहीं होती न ही गटर में फेंके जाने योग्‍य ही होती है. यह समझने वालों का भ्रम हो सकता है. साहित्‍य व पत्रकारिता के मेन स्‍ट्रीम में भी ऐसी बातें पायी जाती है, जो न सिर्फ गटर में फेंकी जाने वाली होती है बल्कि लगता है कि गटर से ही निकली हुई है. पाठक उसे वैसे ही ग्रहण करते है जिसके योग्‍य वो रचना होती है या उसकी अधिकारी होती है. कई ऐसे ब्‍लॉग है जो कई नई व रोचक जानकारी देते है. हमारा ज्ञानवर्धन करते है, कई ब्‍लॉग तो अपने आप में वि शद जानकारी तक उपलब्‍ध कराते है. जहां तक पत्रकारों के द्वारा अपने मन की खटास को इसमें टांके जाने की बात है, यह पत्रकार की अपनी अभिरुचि या क्षमता पर नि र्भर करता है कि वो अपने मन के वि ष, जहर को किस प्रकार औरों के लिए अम़त बना पाता है. हलाहल पीने वाले ही यह समझ सकते है कि अंम़त की जरूरत किसी कदर लोगों को होती है. जो अच्‍छा पढना, लि खना व समझना चाहते है, उन्‍हें ब्‍लॉग लेखन निश्चित रुप से अपनी ओर खींचता है, यह चालू भाषा में कहे तो बाथरूम सिंगर को गाने का एक बेहतर मौका फराहम करता है. यह समझने की बात है कि आप उस संगीत को कैसे लेते है. आपकी मौलिक प्रति भा का कैसे विकास होता है. कैसे आप अपनी जगह बना पाते है. पत्रकारिता के मेन स्‍ट्रीम में या सक्रिय लेखन के क्षेत्र में, कला साहित्‍य से इतर प्रत्‍येक कार्य में यही जददोजहद कार्य करती है. यही किसी को महान तो किसी को शैतान बनाता है.

Monday, October 27, 2008

ब्‍लाॅग लेखन व उसकी पठनीयता

वर्तमान में कई धूरंधर लेखक अपने नये तेवर के साथ ब्‍लॉग लेखन में सामने आ रहे है. इसमें सिनेमा जगत के नामचीन है तो साहित्‍य व खेल जगत के मशहूर ओ मारूफ व्‍यक्ति भी. पत्रकारिता जगत के सदस्‍य तो वैसे भी लि खने में लगे ही थे ब्‍लॉग ने उन्‍हें एक नया मंच प्रदान किया है. आज मैने कई ऐसे ब्‍लॉग को देखा जिन्‍हें देखते ही रह गया. बडी ही सुलझी व साफ सुथरी विचारों से युक्‍त ये अपने आप को दूनिया के बीच प्रस्‍तुत करते है. शायद ब्‍लॉग न होता तो उनके विचार मीडिया के अन्‍य स्रोतों से आने में वर्षो लग जाते. छोटे छोटे शहरों से लोग ब्‍लॉग लि ख रहे है, उनकी भावनाएं उभर कर सामने आ रही है. ये सब संभाल कर रखे जाने योग्‍य है. कुछ नये पुराने ब्‍लॉगों में बी अडडा, हासिया, छाया, मनोवेद इत्‍यादि अच्‍छे प्रभाव बि खेर रहे है. इन्‍हें पाठकों का भरपुर सहयोग मिल रहा है. ब्‍लॉग डायरी के शुरू करने का मकसद बस इतना भर है कि विभिन्‍न ब्‍लॉगों को देखते वक्‍त उनके लेखन पर टिप्‍पणी करने का अवसर तो मौजूद होता है किंतू समान विचारो वाले ब्‍लॉगों पर एक साथ टिप्‍पणी करनी मुश्किल होती है. आइए हम सब ब्‍लॉग लेखन के लिए अपने अनुभव को इस डायरी में दर्ज करें. यह डायरी बिल्‍कूल ही पारदर्शी होगी. किसी भी ब्‍लॉग पर गढे जा रहे विचारों को बिना लाग लपेट के रखा जा सकता है. किसी भी ब्‍लॉग पर चूटकी ली जा सकती है. ब्‍लॉग लेखन को एक नये संतूलित मार्ग व अवसर उपलब्‍ध कराये जा सकते है. यह सब तक संभव नही जबतक आप सबों का सहयोग न मिले. यह बिल्‍कूल वैसा ही जैसे कि खाने में चटनी जो जायका तो बढायेगी ही, स्‍वास्‍थ्‍य को भी ठीक रखेंगी.

Saturday, October 25, 2008

हमसफर

सड़क पर चलते हुए कई बार अनायास आकाश की ओर देखने को जी मचलता है,कितने दिन हुए जीभरकर उसे निहारे हुए, आज तो सिर्फ यही करना है.उसे महसूस करना है जो हरपल हमारे साथ है .इस रहगुजर के हमराही आप भी बन सकते है.तो चले एक कदम आगे.............